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सहपाठी

जब यादों की खिड़की खुलती
क्या खूब नजारा लगता है ।
शिक्षा के मन्दिर में गुजरा
हर लम्हा प्यारा लगता है ।

ना कुछ खोने की चिन्ता थी
ना पाने की अभिलाषा थी।
नजरों मेें संज्ञा अलंकार
रस छन्दो की परिभाषा थी।।
स्वर्णिम लम्हे वो न्यूटन के
गति के नियमों मेें बीते थे ।
कर जोड़ घटाना गुणा भाग
अपने सपनों में जीते थे।।
दिनकर कबीर और प्रेमचन्द का
हर पाठ निराला  लगता है ।
शिक्षा के मन्दिर में गुजरा
हर लम्हा प्यारा लगता है ।।

याद आते वो हंसमुख चेहरे
जो हम को खूब हंसाते थे ।
अध्यापक के गहरे विषयों पर भी
जो हास्य खोज कर लाते थे ।।
पड़ती थी डांट बहुत मन में
अफसोस भी भारी होता था ।
मगर शरारत का यह क्रम
प्रति दिन जारी होता था ।।
बहते हैं पलकों से  आंसू
जब यह द्रश्य दोबारा दिखता है ।
शिक्षा के मन्दिर में गुजरा
हर लम्हा प्यारा लगता है ।।

कुछ रिश्ता ऐसा था अपना
शिक्षा की बगिया के फूलों से,
जैसे मछली  का पानी से
जैसे सावन का झूलों से।
हम बिछड़ गये जीवन दायक
मित्रों  की उस फुलवारी से।
जैसे फूलों की टोली
बिछड़ गयी हो माली से।
मित्रो संग बीता एक एक पल
जीवन का सहारा लगता है ।
शिक्षा के मन्दिर में गुजरा
हर लम्हा प्यारा लगता है ।।
                             
                              "अम्बरीष त्रिपाठी "


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