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Showing posts from November, 2017

सहपाठी

जब यादों की खिड़की खुलती क्या खूब नजारा लगता है । शिक्षा के मन्दिर में गुजरा हर लम्हा प्यारा लगता है । ना कुछ खोने की चिन्ता थी ना पाने की अभिलाषा थी। नजरों मेें संज्ञा अलंकार रस छन्दो की परिभाषा थी।। स्वर्णिम लम्हे वो न्यूटन के गति के नियमों मेें बीते थे । कर जोड़ घटाना गुणा भाग अपने सपनों में जीते थे।। दिनकर कबीर और प्रेमचन्द का हर पाठ निराला  लगता है । शिक्षा के मन्दिर में गुजरा हर लम्हा प्यारा लगता है ।। याद आते वो हंसमुख चेहरे जो हम को खूब हंसाते थे । अध्यापक के गहरे विषयों पर भी जो हास्य खोज कर लाते थे ।। पड़ती थी डांट बहुत मन में अफसोस भी भारी होता था । मगर शरारत का यह क्रम प्रति दिन जारी होता था ।। बहते हैं पलकों से  आंसू जब यह द्रश्य दोबारा दिखता है ।...